जिन जिन अपराधिन सिर नायौ - श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (37)

जिन जिन अपराधिन सिर नायौ - श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (37)

जिन जिन अपराधिन सिर नायौ, रसना नाम उचारी ।
ते-ते निज परिकर में लीये, करि सेवा अधिकारी॥ [1]
मेरी बार अबार करी किहि, हेत कहाँ सुकुंवारी ?
करौ विचार ‘किशोरी’ हिय में, हाँसी होइ तिहारी॥ [2]

- श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (37)

जिन-जिन अपराधी जीवों ने सिर झुकाकर और रसना से आपका नाम उच्चारित किया, उन्हें आपने अपने निज परिकर में स्थान देकर अपनी सेवा का अधिकारी बना लिया। [1]

हे श्री राधा प्यारी! अब मेरी बारी में इतनी देर क्यों लगा रही हो? एक बार कृपा-विचार कीजिए — क्योंकि इससे इस संसार में उपहास मेरा नहीं, आपका ही होगा। [2]