भानुनन्दिनी मो तन हेरो - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (15)

भानुनन्दिनी मो तन हेरो - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (15)

(राग ईमन)
भानुनन्दिनी मो तन हेरो।
तपत रहत मन विषय वासना, शीतल दृष्टि कृपा कण गेरो॥ [1]
खोल लेहु दरबार स्वामिनि, हा-हा अब न करो अवसेरो ।
ललित लड़ैती तन मन अकुलित, श्री वृन्दावन देहु बसेरो ॥ [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (15)

हे भानुनन्दिनी, श्री राधा! मेरी ओर कृपा-दृष्टि डालिये। विषय-वासनाओं से मेरा हृदय तप रहा है— अपनी कृपा-कटाक्ष का एक कण बरसा कर इसे शीतलता प्रदान कीजिए  [1]

हे स्वामिनि जू! अपना दरबार खोल लीजिए, अब विलम्ब न कीजिए। श्री ललित-लड़ैती का तन-मन व्याकुल है— मुझे श्रीवृन्दावन में अखंड वास दीजिए। [2]