नवल नवनागरी रूप गुण आगरी - श्री द्वारकेश जी (पुष्टिमार्गी भक्त)

नवल नवनागरी रूप गुण आगरी - श्री द्वारकेश जी (पुष्टिमार्गी भक्त)

(राग-केदारो, ताल-चर्चरी)
नवल नवनागरी रूप गुण आगरी,
सुभग श्यामा ललित राजराजेश्वरी ॥ [1]
नवल रस भाव भूषित नयन चपल,
चित चाह चंचल भृकुटि स्नेह हित रसभरी ॥ [2]
नवल नव रस देन उलट रस लेन कछु,
कहत रसबेन रसरीत सों अनुसरी ॥ [3]
निकट 'द्वारकेश' कर जोर बिनती करे,
युगल रस केलि में करहु मोहे अनुचरी ॥ [4]

- श्री द्वारकेश जी (पुष्टिमार्गी भक्त)

श्री श्यामा (राधा) नित्य नवीन, अनुपम नागरी हैं, जो रूप और गुणों की खान हैं।  वे अत्यन्त सुभग, ललित और राजराजेश्वरी स्वरूपा हैं । [1]

नित्य नवीन रस से ओतप्रोत, सुंदर भाव से अलंकृत, उनके नयन चपल हैं। उनके चित्त में प्रियतम के मिलन की तीर्व चाह है। उनकी भृकुटि चंचल है, छवि रसमयी (प्रेम से ओतप्रोत), हितकारी और सम्पूर्ण स्वरूप रस से परिपूर्ण है। [2]

वे सदैव नवल-रस की प्रदात्री भी हैं और स्वयं उस रस की ग्राहिका भी। उनकी वाणी रस से भरी है, और वह रस-रीति का ही अनुसरण करती हैं। [3]

श्री द्वारकेश जी हाथ जोड़ कर विनती करते हैं —हे श्री राधा महारानी! मुझे भी युगल-रस-केलि में एक दासी बना लीजिए। [4]