(राग पूरिया कल्याण--ताल तिताला)
नाथ मुहिं कीजै व्रजकी मोर।
निश दिन तेरो नृत्य करौंगी, ब्रजकी खोरन खोर ॥ [1]
श्याम घटा सम घात निरखिके, कूकोंगी चहुँ ओर ।
मोर मुकुट माथेके काजें, देहौं पंखा टोर ॥ [2]
ब्रजबासिन सँग रहस करूँगी, नचिहौं पंख मरोर ।
‘रूपकुंवरि’ रानी सरनागत, जय जय जुगलकिशोर ॥ [3]
- रूप कुँवरि जी
हे नाथ! मुझे ब्रज की मोरनी बना लीजिए। मैं दिन-रात व्रज की गलियों में आपके लिए नृत्य करूँगी। [1]
श्याम घटा के समान आपकी रूप-माधुरी को निहारती हुई चारों ओर कूक करूँगी और आपके मस्तक के लिए मोर-मुकुट हेतु अपने पंख अर्पित कर दूँगी। [2]
ब्रजवासियों के संग आनंद करूँगी, पंख फैलाकर नाचूँगी। श्री रूपकुँवरि जी कहती हैं कि चाहे जैसे भी रखो, मैं तो आपकी शरण में हूँ—युगल सरकार की जय हो। [3]
नाथ मुहिं कीजै व्रजकी मोर।
निश दिन तेरो नृत्य करौंगी, ब्रजकी खोरन खोर ॥ [1]
श्याम घटा सम घात निरखिके, कूकोंगी चहुँ ओर ।
मोर मुकुट माथेके काजें, देहौं पंखा टोर ॥ [2]
ब्रजबासिन सँग रहस करूँगी, नचिहौं पंख मरोर ।
‘रूपकुंवरि’ रानी सरनागत, जय जय जुगलकिशोर ॥ [3]
- रूप कुँवरि जी
हे नाथ! मुझे ब्रज की मोरनी बना लीजिए। मैं दिन-रात व्रज की गलियों में आपके लिए नृत्य करूँगी। [1]
श्याम घटा के समान आपकी रूप-माधुरी को निहारती हुई चारों ओर कूक करूँगी और आपके मस्तक के लिए मोर-मुकुट हेतु अपने पंख अर्पित कर दूँगी। [2]
ब्रजवासियों के संग आनंद करूँगी, पंख फैलाकर नाचूँगी। श्री रूपकुँवरि जी कहती हैं कि चाहे जैसे भी रखो, मैं तो आपकी शरण में हूँ—युगल सरकार की जय हो। [3]

