करुणा भरे प्रिया दृग तोरैं।
सहज कृपा की उठत तरंगें, त्रिभुवन रस में बोरें ॥ [1]
उमड़त कृपा सिन्धु परिपूरण, दिस-दिस लेत हिलोरें।
'भोरी' परम अभागी तौहू, इनकौ आसरौ मोरें ॥ [2]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (76)
हे श्रीप्रियाजू ! आपके नेत्रों में करुणा का सागर भरा हुआ है, जिसमें स्वाभाविक रूप से कृपा की ऊँची-ऊँची तरंगें उठती रहती हैं, जिन्होंने तीनों लोकों को रस से सराबोर कर दिया है। [1]
कृपा का यह समुद्र जब पूरी तरह से उफान पर होता है, तब इसकी लहरें चारों दिशाओं में फैल जाती हैं। श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि मैं अभागी फिर भी आपकी कृपा से वंचित हूँ; किन्तु मैंने अपनी आशा छोड़ी नहीं है। मुझे अब भी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आपकी कृपा मुझ पर होकर ही रहेगी। [2]
सहज कृपा की उठत तरंगें, त्रिभुवन रस में बोरें ॥ [1]
उमड़त कृपा सिन्धु परिपूरण, दिस-दिस लेत हिलोरें।
'भोरी' परम अभागी तौहू, इनकौ आसरौ मोरें ॥ [2]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (76)
हे श्रीप्रियाजू ! आपके नेत्रों में करुणा का सागर भरा हुआ है, जिसमें स्वाभाविक रूप से कृपा की ऊँची-ऊँची तरंगें उठती रहती हैं, जिन्होंने तीनों लोकों को रस से सराबोर कर दिया है। [1]
कृपा का यह समुद्र जब पूरी तरह से उफान पर होता है, तब इसकी लहरें चारों दिशाओं में फैल जाती हैं। श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि मैं अभागी फिर भी आपकी कृपा से वंचित हूँ; किन्तु मैंने अपनी आशा छोड़ी नहीं है। मुझे अब भी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आपकी कृपा मुझ पर होकर ही रहेगी। [2]

