जाके प्रिय न राम बैदैही - श्री तुलसीदास जी (मीराबाई को भेजा पत्र)

जाके प्रिय न राम बैदैही - श्री तुलसीदास जी (मीराबाई को भेजा पत्र)

(राग सोरठ)
जाके प्रिय न राम बैदैही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥ [1]
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥ [2]
नाते नेह राम के मनियत, सुहृद सुसेब्य जहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं॥ [3]
तुलसी सो सब भाँति परम हित, पूज्य प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥ [4]

- श्री तुलसीदास जी (मीराबाई को भेजा पत्र)

एक बार मीराबाई ने तुलसीदास जी से पूछा — “मेरे परिवारवाले भजन-मार्ग में बाधा पहुँचाते हैं, मुझे क्या करना चाहिए?” इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास जी ने यह पद रचकर उन्हें भेजा।

जिसको भगवान राम प्रिय न हों अर्थात् जिसका भगवान से प्रेम न हो, भले ही वे हमारे अत्यन्त स्नेही क्यों न हों, फिर भी उन्हें करोड़ों शत्रुओं के समान त्याग देना चाहिए। [1]

प्रह्लाद ने अपने पिता (हिरण्यकशिपु) को, विभीषण ने अपने भाई (रावण) को, भरत ने अपनी माता (कैकयी) को, बलि ने अपने गुरु (शुक्राचार्य) को और ब्रज की गोपियों ने अपने-अपने पतियों को त्याग दिया था, और उन सबका त्याग परम मंगलकारी सिद्ध हुआ। [2]

राम से जुड़ा स्नेह ही सच्चा नाता है। जो भी इस संसार में वास्तविक मित्र अथवा पूज्य है, वह केवल इसीलिए है क्योंकि उसने भगवान राम से अनन्य प्रेम किया है। उस अंजन को आँखों में लगाने का क्या लाभ जिससे आँख ही चली जाए, अब इससे आगे मैं क्या कहूँ अर्थात् यदि अपने प्रियजन भगवान के प्रेम में ही बाधा उत्पन्न करने लगें, तो उन्हें त्याग कर प्रभु-प्रेम में लग जाना चाहिए। [3]

श्री तुलसीदास कहते हैं कि जिनके संग या उपदेश से भगवान के चरणों में अनन्य प्रेम उत्पन्न हो, वही सब प्रकार से हमारा परम हितकारी, पूजनीय और प्राणों से भी अधिक प्रिय है—हमारा तो यही मत है। [4]