किती न गोकुल कुल-बधू, काहि न किहिं सिख दीन ।
कौनै तजी न कुल-गली, ह्वै मुरली-सुर लीन ॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (22)
गोकुल में न जाने कितनी कुलवधुएँ हैं, और ऐसी कोई नहीं जिसे किसी ने शिक्षा न दी हो; परन्तु कुलवधू होकर और उपदेश सुनकर भी ऐसी कोई न बची, जो श्रीकृष्ण की वंशी की तान में डूबकर लज्जा और लोकमर्यादा का त्याग न कर बैठी हो।
कौनै तजी न कुल-गली, ह्वै मुरली-सुर लीन ॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (22)
गोकुल में न जाने कितनी कुलवधुएँ हैं, और ऐसी कोई नहीं जिसे किसी ने शिक्षा न दी हो; परन्तु कुलवधू होकर और उपदेश सुनकर भी ऐसी कोई न बची, जो श्रीकृष्ण की वंशी की तान में डूबकर लज्जा और लोकमर्यादा का त्याग न कर बैठी हो।

