(राग सारंग)
कहों री जो कहिबे की होइ ।
श्रीबिहारी बिहारनि कौ सुख सखी री, जानत नाहिने कोइ ॥ [1]
प्रेम मगन रस मत्त रहत नित, तन मन प्रान समोइ ।
श्रीबिहारीबिहारनिदासि लडावत, अंग संग रही भोइ ॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (182)
हे सखी, चाहे कोई इसे कितना भी बताने का प्रयास करे, पर सत्य यही है कि श्री बिहारी–बिहारिणी जू का नित्य विहार ऐसा अद्भुत और विलक्षण रस से परिपूर्ण है, जिसकी गहराई को कोई भी पूर्णतः समझ नहीं सकता। [1]
उस रस में प्रिया–प्रियतम और उनकी सहचरियाँ इस प्रकार निमग्न रहती हैं कि तन, मन और प्राण सब उसी में विलीन हो जाते हैं। श्री बिहारी–बिहारिणी जू की दासियाँ प्रेमोन्माद से भरकर युगल को सदा लाड़ लड़ाती हुई, उनके अंग–संग रहकर उसी रस का अखंड आस्वादन करती रहती हैं। [2]
कहों री जो कहिबे की होइ ।
श्रीबिहारी बिहारनि कौ सुख सखी री, जानत नाहिने कोइ ॥ [1]
प्रेम मगन रस मत्त रहत नित, तन मन प्रान समोइ ।
श्रीबिहारीबिहारनिदासि लडावत, अंग संग रही भोइ ॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (182)
हे सखी, चाहे कोई इसे कितना भी बताने का प्रयास करे, पर सत्य यही है कि श्री बिहारी–बिहारिणी जू का नित्य विहार ऐसा अद्भुत और विलक्षण रस से परिपूर्ण है, जिसकी गहराई को कोई भी पूर्णतः समझ नहीं सकता। [1]
उस रस में प्रिया–प्रियतम और उनकी सहचरियाँ इस प्रकार निमग्न रहती हैं कि तन, मन और प्राण सब उसी में विलीन हो जाते हैं। श्री बिहारी–बिहारिणी जू की दासियाँ प्रेमोन्माद से भरकर युगल को सदा लाड़ लड़ाती हुई, उनके अंग–संग रहकर उसी रस का अखंड आस्वादन करती रहती हैं। [2]

