(सवैया)
रूप की रासि किसोर-किसोरी, रँगे रस-केलि निकुंज बिहारा।
माते अनंग प्रवीन सबै अँग, फूल सिरीषहु ते सुकुमारा ॥ [1]
बसौ उर-नैननिं में दिन-रैन, नसौ मन के जिते आहिं बिकारा।
जाँचत बात न और कछु 'ध्रुव', देहु प्रिये रस-प्रेम की धारा॥ [2]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.44)
रूप और माधुरी की निधि, श्री लाड़िली-लाल वृन्दावन धाम के मधुर निकुंजों में नित्य विहार परायण रस-केली में अनुरक्त हैं। वे प्रेम की समस्त कलाओं में पारंगत और कुसुम से भी अधिक कोमल हैं। [1]
मेरी यही विनती है कि वे सदा मेरे हृदय और नेत्रों में निवास करें, और उनके कृपा-प्रसाद से मेरे अंतःकरण के सभी विकार सदा के लिए मिट जाएँ। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं—मुझे और कुछ नहीं चाहिए; बस वे अपनी प्रेममयी सरस धारा मेरे हृदय में निरंतर प्रवाहित करते रहें। [2]
रूप की रासि किसोर-किसोरी, रँगे रस-केलि निकुंज बिहारा।
माते अनंग प्रवीन सबै अँग, फूल सिरीषहु ते सुकुमारा ॥ [1]
बसौ उर-नैननिं में दिन-रैन, नसौ मन के जिते आहिं बिकारा।
जाँचत बात न और कछु 'ध्रुव', देहु प्रिये रस-प्रेम की धारा॥ [2]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.44)
रूप और माधुरी की निधि, श्री लाड़िली-लाल वृन्दावन धाम के मधुर निकुंजों में नित्य विहार परायण रस-केली में अनुरक्त हैं। वे प्रेम की समस्त कलाओं में पारंगत और कुसुम से भी अधिक कोमल हैं। [1]
मेरी यही विनती है कि वे सदा मेरे हृदय और नेत्रों में निवास करें, और उनके कृपा-प्रसाद से मेरे अंतःकरण के सभी विकार सदा के लिए मिट जाएँ। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं—मुझे और कुछ नहीं चाहिए; बस वे अपनी प्रेममयी सरस धारा मेरे हृदय में निरंतर प्रवाहित करते रहें। [2]

