बंदौं श्रीहरिदास के, चरन-कमल चित लाइ ।
जिन निज उर की माधुरी, दई प्रतच्छ दिखाइ ॥
- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (19)
मैं मन लगाकर स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों का वंदन करता हूँ जिन्होंने अपने हृदय की रस-माधुरी अर्थात् प्रिया प्रियतम के नित्य विहार रस को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करके दिखाया है ।
जिन निज उर की माधुरी, दई प्रतच्छ दिखाइ ॥
- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (19)
मैं मन लगाकर स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों का वंदन करता हूँ जिन्होंने अपने हृदय की रस-माधुरी अर्थात् प्रिया प्रियतम के नित्य विहार रस को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करके दिखाया है ।

