अब तो कहिबे की न रही - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (123)

अब तो कहिबे की न रही - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (123)

अब तो कहिबे की न रही ।
अपनी बाँह छाँहतर राख्यो, वृन्दाविपुन मही ॥ [1]
ऐसें ही करि कृपा मेटियै, काम क्रोध सबही ।
‘नागरिया’ की छूटि जाय, तुम्हैं सब ही कहा-कही ॥ [2]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (123)

हे श्री राधारानी! अब मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं बचा। आपने करुणा करके मुझे अपनी बाहों से पकड़कर, अपने चरण-कमलों की शीतल छाया में आश्रय दिया और श्री धाम वृन्दावन की परम पावन भूमि में वास प्रदान किया है। [1]

अब ऐसी ही कृपा और कीजिए कि मेरे अंतःकरण में स्थित काम, क्रोध आदि सभी दोष सर्वथा नष्ट हो जाएँ, जिससे नागरीदास समस्त वाणी-विचार से मुक्त होकर केवल आपकी निष्काम सेवा का अधिकारी बन सके। [2]