मान अपमान अभिमान तजि करि वृन्दावन वास - श्री अनन्य अलि, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.83)

मान अपमान अभिमान तजि करि वृन्दावन वास - श्री अनन्य अलि, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.83)

मान अपमान अभिमान तजि, करि वृन्दावन वास ।
रज में रजरज ह्वै रहौ, मन में अधिक प्रकाश ॥

- श्री अनन्य अली, श्री अनन्य अली जी की वाणी, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.83)

मान, अपमान और अहंकार को त्यागकर श्री धाम वृन्दावन में वास करो। वहाँ की परम मंगलकारी रज में रज बनकर रहो, तभी मन में दिव्य प्रेम का प्रकाश प्रकट होगा।