लाडिली विनय सुनो सुख रासी - श्री सरस माधुरी जी

लाडिली विनय सुनो सुख रासी - श्री सरस माधुरी जी

(राग बिहाग)
लाडिली विनय सुनो सुख रासी ।
तव मुख आनंदकन्द चन्द की, नैन चकोरी प्यासी ॥ [1]
बिन निरखे रस रूप माधुरी, निशि दिन रहत उदासी।
सरसमाधुरी जान आपनी, निज दासिन की दासी ॥ [2]

- श्री सरस माधुरी

हे लाड़िली! हे सुख-राशि! कृपा कर मेरी विनती स्वीकार कीजिए। आपका मुखचंद्र आनंद का परम स्रोत है, जिसे निहारने के लिए मेरी आँखें चकोर के समान व्याकुल रहती हैं । [1]

जब तक मैं आपकी रूप-रस माधुरी का पान नहीं करती, तब तक मेरा चित्त दिन-रात उदासी में डूबा रहता है। सरस माधुरी निवेदन करती हैं—हे प्यारी! मुझे अपनी दासी की भी दासी समझिए । [2]