(राग सारंग)
स्यामा तू करुना को सागर ।
तुव दुति निरखै कुंजबिहारी, परम रसिक वर नागर ॥ [1]
ललित बदन दृग सोभा सुंदरि, अद्भुत रूप उजागर ।
गोरे तन सुख सुरंग चूनरी, निरखि रूप गुन पागर ॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (186)
हे श्यामाजू (श्री राधा)! आप अगाध करुणा की सागर हैं। आपकी दिव्य कान्ति को निहारकर रसिक-चूड़ामणि श्री कुंजबिहारी भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। [1]
आपके मुख-कमल और नेत्रों की शोभा अत्यन्त मनोहारिणी है, जो अद्भुत रूप-माधुरी का प्रकाश करती है। आपका गौर-वर्ण, प्रसन्न-चित्त मुख-मण्डल तथा सुरंग चूनरी को निहारकर रूप सखी आपके प्रेम में उन्मत्त हो उठती है।
स्यामा तू करुना को सागर ।
तुव दुति निरखै कुंजबिहारी, परम रसिक वर नागर ॥ [1]
ललित बदन दृग सोभा सुंदरि, अद्भुत रूप उजागर ।
गोरे तन सुख सुरंग चूनरी, निरखि रूप गुन पागर ॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (186)
हे श्यामाजू (श्री राधा)! आप अगाध करुणा की सागर हैं। आपकी दिव्य कान्ति को निहारकर रसिक-चूड़ामणि श्री कुंजबिहारी भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। [1]
आपके मुख-कमल और नेत्रों की शोभा अत्यन्त मनोहारिणी है, जो अद्भुत रूप-माधुरी का प्रकाश करती है। आपका गौर-वर्ण, प्रसन्न-चित्त मुख-मण्डल तथा सुरंग चूनरी को निहारकर रूप सखी आपके प्रेम में उन्मत्त हो उठती है।

