रसिकजन की मैं बलिहारी - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री रसिक भक्तजन महिमामृत (177.2)

रसिकजन की मैं बलिहारी - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री रसिक भक्तजन महिमामृत (177.2)

(पद रेखता)
रसिकजन की मैं बलिहारी, पियाप्यारी जिन उरधारी।
वृन्दावनधाम में डोलें, अमानी मानदे बोलें ॥ [1]
सबहि से प्रेम हितकारी, त्रिगुण से रीति जिन न्यारी।
प्रेममें मगन गुण गावैं, माधुरी तिनको शिरनावैं ॥ [2]

- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्री रसिक भक्तजन महिमामृत (177.2)

मैं उन रसिकजनों पर बलिहारी जाता हूँ, जिनके हृदय में अनन्य रूप से प्रिया-प्रियतम बसते हैं । वे वृन्दावन धाम में विचरण करते हैं, स्वयं निरभिमानी होकर भी सबको मान देने वाले वचन बोलते हैं। [1]

वे समस्त जीवों के प्रति प्रेमभाव से युक्त और सबका हित करने वाले हैं, जिनकी प्रीति की रीति त्रिगुणातीत है। प्रेम में पूर्णतया निमग्न होकर वे निरंतर श्री राधा-कृष्ण के गुणों का मधुर गान करते रहते हैं। ऐसे रसिकों के चरणों में श्री अलि माधुरी श्रद्धापूर्वक अपना शीश अर्पित करते हैं। [2]