याही तें सब मुक्ति तें लही बड़ाई प्रेम - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (35)

याही तें सब मुक्ति तें लही बड़ाई प्रेम - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (35)

याही तें सब मुक्ति तें, लही बड़ाई प्रेम ।
प्रेम भए नसि जाहिं सब, बँधें जगत के नेम॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (35)

प्रेम में दो शरीरों को एक कर देने की शक्ति होती है, इसी कारण प्रेम का स्थान मुक्ति से भी ऊँचा माना गया है। जहाँ प्रेम प्रकट हो जाता है, वहाँ समस्त नियम और बंधन स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं अर्थात् प्रेम किसी भी नियम का पालन नहीं करता।