गुंजन मधुपन सुनत अलींरी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (22)

गुंजन मधुपन सुनत अलींरी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (22)

(राग भैरव)
गुंजन मधुपन सुनत अलींरी ।
उमगीं मनौं प्रेम की सरिता, रूप के सिंधु चलींरी ॥ [1]
विहँसत बदन हँसत विगसत-सी, जनु अनुराग कलींरी।
रूप अनूप लखें अलबेली, आई वारि भलींरी ॥ [2]

- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (22)

प्रभात बेला में जैसे ही सखियों के कानों में भौंरों की मधुर गुंजार पड़ी, वे आनंद-विभोर होकर महल की ओर बढ़ चलीं। उनकी चाल ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो प्रेम की नदी उफनकर रूप के अपार महासागर की ओर प्रवाहित हो रही हो। [1]

उनके मुख कमल मुस्कान से खिल उठे, रोम-रोम पुलकित हो गया मानो प्रेम की कोमल कली पूर्ण रूप से प्रस्फुटित हो गई हो। श्री अलबेली अलि कहती हैं कि जब उन्होंने श्री राधा के परम अद्भुत स्वरूप के दर्शन किए, तब उस अनुपम छवि को निहारकर वे ऐसी आनंदित हो गई कि बार-बार स्वयं को बलिहार करने लगीं। [2]