पाछें ललिता, ता आगे स्यामा प्यारी - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत)

पाछें ललिता, ता आगे स्यामा प्यारी - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत)

(राग पूर्वी)
पाछें ललिता, ता आगे स्यामा प्यारी,
ता आगें पिय मारग फूल बिछावत जात । [1]
कठिन कली बीनि करत न्यारी-न्यारी,
प्यारी के चरन कोमल जानि, सकुचित गड़िबे डरात॥ [2]
अरुझी लता सु कर निरवारत,
पाछें डारत द्रुम पल्लव-पात । [3]
‘सूरदास मदनमोहन’ पिय की अधीनताई,
देखत मेरे नैन सिरात ॥ [4]

- श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत)

ललिता पीछे-पीछे चल रही हैं, उनके आगे प्यारी श्यामा (राधा) जू हैं, और उनसे आगे प्रियतम श्री कृष्ण मार्ग में फूल बिछाते हुए चल रहे हैं। [1]

वे कठोर कलियों को एक-एक कर सावधानी से चुनकर अलग कर रहे हैं, क्योंकि प्यारी जू के चरण अत्यन्त कोमल हैं, उनके गड़ने के भय से उनका हृदय संकुचित हो रहा है। [2]

अपने कर-कमलों से वे उलझी हुई लताओं को हटाते जा रहे हैं और मार्ग में वृक्षों के कोमल पत्ते-पल्लव बिछाकर उसे और भी सुखद बना रहे हैं। [3]

श्री सूरदास मदनमोहन कहते हैं कि प्रियतम श्यामसुन्दर की श्री राधा के प्रति ऐसी पूर्ण अधीनता और दास्य-भाव को निहारकर मेरे नेत्र परम तृप्ति को प्राप्त हो रहे हैं। [4]