छबीले नील घन की पूतरी - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली

छबीले नील घन की पूतरी - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली

(राग-गौड़ सारंग, ताल-झूमरा)
छबीले नील घन की पूतरी क्रीड़त बृंदाबन माँहीं।
बिबिध भूषन धरें बंसी अधर धरि चलत देखत परछाँहीं॥ [1]
सबके हिय करषत, सोभा-बूँदन बरषत,
गोपीजन-लोचन-चातक निरखत जिवाहीं। [2]
नंददास कोऊ एक दामिनि-सी ढिंग
ठाड़ी ताके गरें बर दियें बाँहीं॥ [3]

- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली

हे सखी! नील मेघ सदृश कोई छबीली रूप-मूर्ति (श्री कृष्ण) इस वृन्दावन में क्रीड़ा कर रही है। उनके अंग-अंग पर विविध आभूषण सुशोभित हैं, अधरों पर मधुर बंसी विराजमान है, और उनकी परछाईं तक की शोभा भी मन को मोहित कर लेती है। [1]

उनकी अलौकिक शोभा सहज ही सबके हृदय को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। गोपियाँ चातक-पक्षी के समान उत्कंठित नयनों से उनके रूप का निरन्तर पान करती हैं और उसी दर्शन को अपना जीवन-प्राण मानती हैं। [2]

श्री नंददास कहते हैं कि जिस प्रकार मेघ के संग विद्युत् लिपटी रहती है, उसी प्रकार उनकी कोई परम प्रिय गोपी (श्री राधा), स्नेह से बाँहें डाले, उनके समीप आलिंगनबद्ध खड़ी हैं। [3]