बैठी रंग भरी है रंगीली रंग रावटी में - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (18)

बैठी रंग भरी है रंगीली रंग रावटी में - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (18)

(कवित्त)
बैठी रंग भरी है रंगीली रंग रावटी में,
कहाँ लौ बखानौं, सुंदराई सिरताज की। [1]
चाँदनी की, चंपक की, चंचला चमीकर की,
इंदमा, तिलोत्तमा की सोभा कौन काज की ॥ [2]
मोतिन के हार गरें, मोतिन सौ माँग भरै,
मोतिन सौं बेनि गुही हठी सुखसाज की। [3]
चाल गजराज, मृगराज की-सी लंक दुज,
राज-सौ वदन, राजै रानी ब्रजराज की ॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (18)

प्रेम-रंग से सराबोर, रंगीली श्री राधा रंगमहल-रूपी दिव्य मंडप में अद्भुत शोभा के साथ विराजमान हैं। ऐसी परम सिरताज महारानी की अनुपम सुंदरता का वर्णन शब्दों की सीमा में कैसे समा सकता है। [1]

चाँदनी की उज्ज्वलता, चंपा की कोमलता, स्वर्ण-कान्ति की दीप्ति, इंदुमा और तिलोत्तमा की समस्त शोभा—सब मिलकर भी उनकी एक झलक के सामने फीकी प्रतीत होती है। [2]

उनके कंठ में मोतियों के मनोहर हार शोभित हैं, माँग मोतियों से सुसज्जित है और वेणी भी मोतियों से गुँथी हुई है—उनका सम्पूर्ण श्रृंगार अलौकिक माधुरी से ओत-प्रोत है। [3]

उनकी चाल में गजराज-सी गरिमा, सिंह के समान सुघड़ कटि प्रदेश और राजाओं-सा तेजस्वी स्वरूप है। ऐसी ब्रजराज श्री कृष्ण की महारानी, श्री राधा, परम शोभायमान विराज रही हैं। [4]