अब सागर के तरन को, है हरि नाम आधार।
सो बिसरायो सहज ही, रे मन मूढ़ गँवार॥
- श्री मलूक दास
इस भव-सागर को पार करने का एकमात्र सहारा हरि का नाम ही है। हे मूर्ख गँवार मन! तूने उसे सहज ही भुला दिया है।
सो बिसरायो सहज ही, रे मन मूढ़ गँवार॥
- श्री मलूक दास
इस भव-सागर को पार करने का एकमात्र सहारा हरि का नाम ही है। हे मूर्ख गँवार मन! तूने उसे सहज ही भुला दिया है।

