कहो पिय किन तोहिं रसिक बनायो - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, विरह माधुरी (80)

कहो पिय किन तोहिं रसिक बनायो - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, विरह माधुरी (80)

कहो पिय!, किन तोहिं रसिक बनायो॥
कब वराह बनि रूप-राशि-बल, मोहनमदन कहायो।
धरि तनु मीन वारि बिच बसि कब, गोपिन चीर चुरायो॥ [1]
ललित त्रिभंग रूप धरि कच्छप, कब वर वेनु बजायो।
राघवेन्द्र, वामन बनि कब तुम, सखियन रास रचायो॥ [2]
कब नृसिंह बनि रुद्र रूप धरि, प्रणय-मान-रस पायो।
लहि 'कृपालु' राधे-बल कछु रस, रसिकन नाम गिनायो॥ [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, विरह माधुरी (80)

एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था? [1]

कच्छपावतार में तुमने कछुए का शरीर धारण करके कब शरीर के तीन भाग से टेढ़े होकर मधुर मुरली की तान छेड़ी थी? रामावतार एवं वामनावतार में तुमने गोपियों के साथ कब महारास का रसास्वादन किया था? [2]

नृसिंहावतार में कब उस भयानक रूप द्वारा किसी प्रेयसी को मनाने या स्वयं मान करने का रस पाया था? श्री कृपालु जी कहते हैं कि किशोरी जी की कृपा से ही कुछ रस पाकर इस कृष्णावतार में अपने को भी रसिक मानने लगे। उसके पूर्व अवतारों में दैत्य-हनन, साधु-परित्राण एवं धर्म संस्थापन के सिवाय और किया ही क्या था? [3]