मथुरामपि संप्राप्य योऽन्यत्र कुरुते स्पृहाम् ।
दुर्बुद्धेस्तस्य किं ज्ञानं सोऽज्ञानेन विजृंभितः॥
- स्कंद पुराण, मथुरा माहात्म्यम् (2.5.17.37)
यदि मथुरा (ब्रज) पहुँचकर भी कोई अन्य स्थान की इच्छा करे, तो उस दुर्बुद्धि व्यक्ति को अभी पूर्ण ज्ञान कहाँ है? वह तो अपनी अज्ञानता ही प्रकट करता है।
दुर्बुद्धेस्तस्य किं ज्ञानं सोऽज्ञानेन विजृंभितः॥
- स्कंद पुराण, मथुरा माहात्म्यम् (2.5.17.37)
यदि मथुरा (ब्रज) पहुँचकर भी कोई अन्य स्थान की इच्छा करे, तो उस दुर्बुद्धि व्यक्ति को अभी पूर्ण ज्ञान कहाँ है? वह तो अपनी अज्ञानता ही प्रकट करता है।

