राखि हृदै प्रिय प्रेम सुधा-रस - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (18)

राखि हृदै प्रिय प्रेम सुधा-रस - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (18)

(सवैया)
राखि हृदै प्रिय प्रेम सुधा-रस, सार दुराइ दिखावत बूर ।
करि विषै तन माया प्रपंच, कृपा बिनु वस्तु लहै क्यों मूर॥ [1]
श्रीगुरु प्रेम प्रसन्न बसे बन, धर्म अनन्य महा मन सूर।
श्रीनागरिदास को दै सुख संग, श्रीबिहारीनि जानि परयो गर कूर॥ [2]

- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (18)

यह पद साधक के उस करुण भाव को प्रकट करता है, जहाँ वह श्री नित्यविहारिणी जू (श्री राधा) से विनम्र निवेदन करता है—
हे स्वामिनी! आप तो प्रेमरस की अमृतधारा हैं, फिर आपने अपने उस प्रेम-रस-सुधा रूपी खज़ाने को छिपाकर सारहीन विषय-प्रपंच रूपी भूसे में क्यों उलझा दिया है? यह अटल सत्य है कि आपकी कृपा के बिना यह अज्ञानी जीव आपके प्रेम-धन को कदापि प्राप्त नहीं कर सकता। [1]

जो भक्त श्री गुरुदेव की आज्ञा का पालन करते हुए श्री धाम वृन्दावन में अनन्य भाव से वास करता है, वही इस दुर्लभ अनन्य भक्ति के पथ पर अग्रसर होकर सच्चा शूरवीर बनता है। श्री नागरीदेव जी विनयपूर्वक कहते हैं—अतः कृपा कर मुझे भी अपने प्रेम-रस में पूर्णतः सराबोर कर दीजिए, अपना अंग-संग प्रदान कीजिए, और मुझ जैसे कठोर हृदय वाले अयोग्य जन से भी, जो आपके चरणों में आ पड़ा है, करुणा कर निभा लीजिए। [2]