नर देही द्वारौ खुल्यौ हरि पावन की घात - श्री हरिराम व्यास,  व्यास वाणी, साखी (87)

नर देही द्वारौ खुल्यौ हरि पावन की घात - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (87)

नर देही द्वारौ खुल्यौ, हरि पावन की घात ।
'व्यास' फेरि नहिं लगतु है, तरुवर टूट्यौ पात ॥

- श्री हरिराम व्यास,  व्यास वाणी, साखी (87)

मानव देह रूपी दुर्लभ अवसर भगवान हरि की प्राप्ति तथा जन्म–मृत्यु के चक्र से सदा के लिए मुक्त होने का खुला हुआ द्वार है। श्री हरिराम व्यास जी सचेत करते हैं कि यदि यह अमूल्य अवसर एक बार हाथ से निकल गया, तो फिर भगवद्-प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती—जैसे वृक्ष से टूटा हुआ पत्ता दोबारा उससे नहीं जुड़ सकता।