(कवित्त)
किधौं रूप सागर तें प्रगटे कमल जुग,
किधौं रतिराजजू के मन के हरण हैं। [1]
किधौं हर भूषण की क्षण हरण हारे,
किधौं प्राण प्यारे भारे विश्व के भरण हैं ॥ [2]
किधौं हैं मराल किधौं इन्दुमण्डली के भूप,
किधौं छवि छत्र सब सुख के करण हैं। [3]
किधौं बन धरण हैं कि वन हीं धरण,
‘प्रेमसखी’ हैं सरण किधौं प्यारी के चरण हैं ॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (25)
कभी वे ऐसे लगते हैं मानो रूप-सागर से प्रकट हुए दो कमल हों, कभी मानो कामदेव को भी लज्जित करने वाली शोभा युक्त हों। [1]
कभी समस्त आभूषणों की शोभा को एक क्षण में हर लेने वाले हों, और कभी समस्त जगत का पालन करने वाले, मानो प्राणों से भी अधिक प्रिय हों। [2]
कभी वे हंस-से कोमल जान पड़ते हैं, कभी चन्द्रमण्डल के नायक के समान उज्जवल, और कभी उनकी छवि समस्त सुखों का आश्रय और कारण लगती है। [3]
कभी वे श्री धाम वृन्दावन को धारण करने वाले प्रतीत होते हैं, तो कभी स्वयं श्री धाम वृन्दावन का आधार लगते हैं। ‘प्रेमसखी’ कहती हैं कि ऐसे हैं श्री राधा महारानी के चरण जिन चरणों की शरण में वे सदा रहती हैं । [4]
किधौं रूप सागर तें प्रगटे कमल जुग,
किधौं रतिराजजू के मन के हरण हैं। [1]
किधौं हर भूषण की क्षण हरण हारे,
किधौं प्राण प्यारे भारे विश्व के भरण हैं ॥ [2]
किधौं हैं मराल किधौं इन्दुमण्डली के भूप,
किधौं छवि छत्र सब सुख के करण हैं। [3]
किधौं बन धरण हैं कि वन हीं धरण,
‘प्रेमसखी’ हैं सरण किधौं प्यारी के चरण हैं ॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (25)
कभी वे ऐसे लगते हैं मानो रूप-सागर से प्रकट हुए दो कमल हों, कभी मानो कामदेव को भी लज्जित करने वाली शोभा युक्त हों। [1]
कभी समस्त आभूषणों की शोभा को एक क्षण में हर लेने वाले हों, और कभी समस्त जगत का पालन करने वाले, मानो प्राणों से भी अधिक प्रिय हों। [2]
कभी वे हंस-से कोमल जान पड़ते हैं, कभी चन्द्रमण्डल के नायक के समान उज्जवल, और कभी उनकी छवि समस्त सुखों का आश्रय और कारण लगती है। [3]
कभी वे श्री धाम वृन्दावन को धारण करने वाले प्रतीत होते हैं, तो कभी स्वयं श्री धाम वृन्दावन का आधार लगते हैं। ‘प्रेमसखी’ कहती हैं कि ऐसे हैं श्री राधा महारानी के चरण जिन चरणों की शरण में वे सदा रहती हैं । [4]

