(राग कानरौ)
तोसी न निहारी मैं तिहारी सोंह मोहिरी ।
करत इतै पै प्रानप्रीतम सों मान मन,
कोंनव सयांन यह सिखयो है तोहिरी ॥ [1]
सदय सुद्रिष्टि रस-वृष्टि करि प्यारी अहे,
प्रांनप्रतिपाल रहे लाल-मुख जोहिरी॥ [2]
रूपरसिक वस रहत सदाई वलि,
तासों यह दुचितई उचित न होंहिरी॥ [3]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (58)
हे प्यारीजू (श्री राधा)! मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि तुम्हारे समान रूप, गुण और चतुरता से युक्त कोई भी मैंने आज तक नहीं देखी। अपने ही प्राणप्रीतम से इस प्रकार मान करना—यह अद्भुत कला तुमने कहाँ से सीखी है? [1]
हे प्यारी! अब करुणा से दृष्टि डालो, अपने प्रेम-रस की वृष्टि करो और प्रियतम को जीवनदान दो, क्योंकि वे निश्चल नेत्रों से केवल तुम्हारी ओर ही निहार रहे हैं। [2]
श्री रूप रसिक कहते हैं—मैं तुम्हारी बार-बार बलिहारी जाता हूँ; लाल जी सदा तुम्हारे ही अधीन रहते हैं, तब उनसे इस प्रकार का मान करना आपको शोभा नहीं देता । [3]
तोसी न निहारी मैं तिहारी सोंह मोहिरी ।
करत इतै पै प्रानप्रीतम सों मान मन,
कोंनव सयांन यह सिखयो है तोहिरी ॥ [1]
सदय सुद्रिष्टि रस-वृष्टि करि प्यारी अहे,
प्रांनप्रतिपाल रहे लाल-मुख जोहिरी॥ [2]
रूपरसिक वस रहत सदाई वलि,
तासों यह दुचितई उचित न होंहिरी॥ [3]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (58)
हे प्यारीजू (श्री राधा)! मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि तुम्हारे समान रूप, गुण और चतुरता से युक्त कोई भी मैंने आज तक नहीं देखी। अपने ही प्राणप्रीतम से इस प्रकार मान करना—यह अद्भुत कला तुमने कहाँ से सीखी है? [1]
हे प्यारी! अब करुणा से दृष्टि डालो, अपने प्रेम-रस की वृष्टि करो और प्रियतम को जीवनदान दो, क्योंकि वे निश्चल नेत्रों से केवल तुम्हारी ओर ही निहार रहे हैं। [2]
श्री रूप रसिक कहते हैं—मैं तुम्हारी बार-बार बलिहारी जाता हूँ; लाल जी सदा तुम्हारे ही अधीन रहते हैं, तब उनसे इस प्रकार का मान करना आपको शोभा नहीं देता । [3]

