मन लाग्यो सुख भोग में, तरन चहै संसार।
‘नारायण’ कैसे बने, दिवस रैन को प्यार॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (51)
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि यदि मन भोग-विलास के सुखों में ही लगा हुआ है, दिन-रात उसी से आसक्ति बनी हुई है और पुन: संसार-सागर से तरना भी चाहे, तो ऐसा कैसे संभव हो सकता है?
‘नारायण’ कैसे बने, दिवस रैन को प्यार॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (51)
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि यदि मन भोग-विलास के सुखों में ही लगा हुआ है, दिन-रात उसी से आसक्ति बनी हुई है और पुन: संसार-सागर से तरना भी चाहे, तो ऐसा कैसे संभव हो सकता है?

