(राग देवगंधार)
दोऊ राजत स्यामा स्याम ।
ब्रज-जुवती-मंडली बिराजति, देखतिं सुरगन-बाम॥ [1]
धन्य धन्य वृंदावन कौ सुख, सुरपुर कौनैं काम।
धनि बृषभानु-सुता, धनि मोहन, धनि गोपनि कौ नाम॥ [2]
इनकी को दासी सरि ह्वै है, धन्य सरद की जाम।
कैसेहुँ ‘सूर’ जनम ब्रज पावैं, यह सुख नहिं तिहुँ धाम॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर (1696)
श्री राधिका और श्यामसुंदर दोनों सुशोभित हैं। ब्रजवनिताओं का सम्पूर्ण समूह भी उनके साथ ही सुशोभित है। आकाश से देवांगनाएँ भी उत्सुक होकर उनके दर्शन कर रही हैं। [1]
वे परस्पर कह रही हैं—यह वृन्दावन अत्यन्त धन्य है, जहाँ सर्वत्र आनन्द का ही विस्तार है। इसके सामने तो स्वर्ग का सौन्दर्य भी तुच्छ प्रतीत होता है। धन्य हैं वृषभानुनन्दिनी श्री राधा महारानी, धन्य हैं नंदनंदन श्रीकृष्ण और धन्य हैं ये समस्त गोपियाँ। [2]
राधा-माधव की इन दासियों के समान सौभाग्य भला किसका हो सकता है। धन्य है यह शरद की रात्रि। हम इस ब्रज में ऐसा आनन्द प्राप्त करने के लिए किस प्रकार जन्म लें। सूरदास जी के वचनों में—ऐसा आनन्द तो तीनों लोकों में नहीं है। [3]
दोऊ राजत स्यामा स्याम ।
ब्रज-जुवती-मंडली बिराजति, देखतिं सुरगन-बाम॥ [1]
धन्य धन्य वृंदावन कौ सुख, सुरपुर कौनैं काम।
धनि बृषभानु-सुता, धनि मोहन, धनि गोपनि कौ नाम॥ [2]
इनकी को दासी सरि ह्वै है, धन्य सरद की जाम।
कैसेहुँ ‘सूर’ जनम ब्रज पावैं, यह सुख नहिं तिहुँ धाम॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर (1696)
श्री राधिका और श्यामसुंदर दोनों सुशोभित हैं। ब्रजवनिताओं का सम्पूर्ण समूह भी उनके साथ ही सुशोभित है। आकाश से देवांगनाएँ भी उत्सुक होकर उनके दर्शन कर रही हैं। [1]
वे परस्पर कह रही हैं—यह वृन्दावन अत्यन्त धन्य है, जहाँ सर्वत्र आनन्द का ही विस्तार है। इसके सामने तो स्वर्ग का सौन्दर्य भी तुच्छ प्रतीत होता है। धन्य हैं वृषभानुनन्दिनी श्री राधा महारानी, धन्य हैं नंदनंदन श्रीकृष्ण और धन्य हैं ये समस्त गोपियाँ। [2]
राधा-माधव की इन दासियों के समान सौभाग्य भला किसका हो सकता है। धन्य है यह शरद की रात्रि। हम इस ब्रज में ऐसा आनन्द प्राप्त करने के लिए किस प्रकार जन्म लें। सूरदास जी के वचनों में—ऐसा आनन्द तो तीनों लोकों में नहीं है। [3]

