यदि कुन्तलकाले सँवारे ही थे - ब्रज के सवैया

यदि कुन्तलकाले सँवारे ही थे - ब्रज के सवैया

(सवैया)
यदि कुन्तलकाले सँवारे ही थे, तो कपोलों पै यों लटकाना न था।
जब कज्जलरेख लगायी थी तो, तिरछे दृग बाण चलाना न था॥ [1]
पहना पटपीत मनोहर तो, हर बार उसे फहराना न था।
यह सुन्दर वेश बनाया था तो, इस भाँति हमें तड़पाना न था॥ [2]

- ब्रज के सवैया

हे श्रीकृष्ण! यदि तुमने पहले ही अपने केश सँवार लिए थे, तो उन्हें इस प्रकार कपोलों पर बिखेर कर लटकाना नहीं चाहिए था। और जब नेत्रों में काजल सजाया था, तब उस तिरछी चितवन से प्रेम-बाण चला कर हमारे हृदय को इस प्रकार घायल भी नहीं करना चाहिए था। [1]

यदि तुमने मनोहर पीताम्बर धारण किया था, तो उसे इस तरह बार-बार लहराकर हमारी सुध-बुध हर लेनी नहीं चाहिए थी। जब इतना सुंदर वेश रचाया था, तो फिर हमें इस असह्य विरह-व्यथा में तड़पाने का भी कोई कारण न था। [2]