अथवा ते प्रवक्ष्यामि परं हेत्वन्तरं शृणु ।
येन वृन्दावनं नाम पुण्यक्षेत्रस्य भारते॥
राधा षोडश नाम्नां च वृन्दा नाम श्रुतौ श्रुतम् ।
तस्याः क्रीडावनं रम्यं येन वृन्दावनं स्मृतम्॥
- ब्रह्मवैवर्तपुराण - 4.17.213-214 (खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 17 / छंद 213-214)
नारायण कहते हैं - हे नारद! पुण्यक्षेत्र भारत में ‘वृन्दावन’ नाम पड़ने का एक अत्यन्त गूढ़ कारण कहता हूँ—तुम उसे ध्यानपूर्वक सुनो। श्रुति में वर्णित श्री राधा के सोलह पवित्र नामों में से एक नाम ‘वृन्दा’ है। इस वन में श्री राधा सदा रमणीय क्रीड़ा करती हैं, इसी कारण यह ‘वृन्दावन’ नाम से प्रसिद्ध हुआ है।
येन वृन्दावनं नाम पुण्यक्षेत्रस्य भारते॥
राधा षोडश नाम्नां च वृन्दा नाम श्रुतौ श्रुतम् ।
तस्याः क्रीडावनं रम्यं येन वृन्दावनं स्मृतम्॥
- ब्रह्मवैवर्तपुराण - 4.17.213-214 (खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 17 / छंद 213-214)
नारायण कहते हैं - हे नारद! पुण्यक्षेत्र भारत में ‘वृन्दावन’ नाम पड़ने का एक अत्यन्त गूढ़ कारण कहता हूँ—तुम उसे ध्यानपूर्वक सुनो। श्रुति में वर्णित श्री राधा के सोलह पवित्र नामों में से एक नाम ‘वृन्दा’ है। इस वन में श्री राधा सदा रमणीय क्रीड़ा करती हैं, इसी कारण यह ‘वृन्दावन’ नाम से प्रसिद्ध हुआ है।

![अथवा ते प्रवक्ष्यामि परं हेत्वन्तरं शृणु - ब्रह्मवैवर्तपुराण - 4.17.213-214 (खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 17 / छंद 213-214)](https://images.brajrasik.org/6965ef7ebdcf3c0004dcf131-m.jpeg)