द्वै लर मोतिन की एक पुंजा पोति कौ सादा - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (20)

द्वै लर मोतिन की एक पुंजा पोति कौ सादा - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (20)

(राग कान्हरौ)
द्वै लर मोतिन की एक पुंजा पोति कौ सादा
नेत्रनि दृष्टि लागै जिनि मेरी। [1]
हाथनि चारि चारि चूरी पाँइनि इकसार चूरा
चौपहलू इकटक रहे हरि हेरी॥ [2]
एक मरगजी सारी तन तें कंचुकी न्यारी
अरु अँचरा की बाँई गति मोरि उरसनि फेरी॥ [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
या रस ही बस भये हरैं हरैं सरकनि नेरी॥ [4]

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (20)

श्री कुंजबिहारिणीजू (श्रीराधा) के गले में मोती की दो लरियों वाला हार, सादा और एकदम सुगठित है।हे सखी! मेरी दृष्टि उनसे हटती ही नहीं। [1]

उनके दोनों हाथों में चार-चार चूड़ियाँ हैं और पैरों में एक चमकता हुआ चार पहलू चूड़ा शोभा पा रहा है। श्रीहरि उन्हें एकटक, बिना पलक झपकाए निहार रहे हैं। [2]

शरीर पर एक मरगजी साड़ी है, जिससे कंचुकी पृथक् रूप से झलक पड़ती है और साड़ी का बायाँ आँचल उन्होंने अपने वक्षस्थल पर मोड़कर फेर लिया है। [3]

स्वामी श्रीहरिदास की आराध्या, स्वामिनी श्यामाजू के अधीन कुंजबिहारी (श्रीकृष्ण), उनकी छवि से पूर्णतः वशीभूत होकर, धीरे-धीरे उनकी ओर सरकते चले आ रहे हैं। [4]