मनसा बाचा कर्मना, सर्व आतमा जांनि ।
‘श्रीबिहारिनिदासि’ बसीकरन, फबी प्रिया सुख दांनि॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (121)
मन, वाणी और कर्म—तथा सम्पूर्ण आत्मभाव से श्री नित्यविहारिणी जू को ही अपना सर्वस्व मानो। इसी दिव्य रस के प्रभाव से श्रीविहारिणी जू की दासी बनकर, उनके पूर्ण वशीकरण में स्थित वह श्रीविहारिणीदासी प्रियाजू को नित्य सुख प्रदान करने वाली बनती है और श्री निकुंज-महल में सुशोभित होकर विराजमान रहती है।
‘श्रीबिहारिनिदासि’ बसीकरन, फबी प्रिया सुख दांनि॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (121)
मन, वाणी और कर्म—तथा सम्पूर्ण आत्मभाव से श्री नित्यविहारिणी जू को ही अपना सर्वस्व मानो। इसी दिव्य रस के प्रभाव से श्रीविहारिणी जू की दासी बनकर, उनके पूर्ण वशीकरण में स्थित वह श्रीविहारिणीदासी प्रियाजू को नित्य सुख प्रदान करने वाली बनती है और श्री निकुंज-महल में सुशोभित होकर विराजमान रहती है।

