(राग गौरी)
बैंनु माई बाजै बंसीवट।
सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट॥ [1]
जटित क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट।
दसननि कुंद कली छबि लज्जित सज्जित कनक समान पीत पट॥ [2]
मुनि मन ध्यान धरत नहिं पावत करत विनोद संग बालक भट।
दास अनन्य भजन रस कारन हित हरिवंश प्रकट लीला नट॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (64)
हे सखी! वंशीवट में श्री कृष्ण की वंशी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। श्री धाम वृन्दावन के परम पावन एवं सुन्दर यमुना तट में सदा वसंत ही रहता है । [1]
श्री कृष्ण रतन जटित मुकुट और मकराकृत कुंडल धारण किए हुए हैं। उनका मुख कमल के समान है जिस पर बालों की लटें भ्रमरों के समान झूल रही हैं। दाँतों की शोभा कुंद-कली को भी लज्जित करती है, और पीत वस्त्र स्वर्ण-सा दमक रहा है। [2]
जिन्हें मुनि ध्यान में भी नहीं पा सकते, वे बाल-सखाओं के संग विनोद कर रहे हैं। श्रीहित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि अपने अनन्य दासों के भजन-रस की सिद्धि के हेतु यह लीला नटवर प्रकट हुये हैं। [3]
बैंनु माई बाजै बंसीवट।
सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट॥ [1]
जटित क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट।
दसननि कुंद कली छबि लज्जित सज्जित कनक समान पीत पट॥ [2]
मुनि मन ध्यान धरत नहिं पावत करत विनोद संग बालक भट।
दास अनन्य भजन रस कारन हित हरिवंश प्रकट लीला नट॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (64)
हे सखी! वंशीवट में श्री कृष्ण की वंशी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। श्री धाम वृन्दावन के परम पावन एवं सुन्दर यमुना तट में सदा वसंत ही रहता है । [1]
श्री कृष्ण रतन जटित मुकुट और मकराकृत कुंडल धारण किए हुए हैं। उनका मुख कमल के समान है जिस पर बालों की लटें भ्रमरों के समान झूल रही हैं। दाँतों की शोभा कुंद-कली को भी लज्जित करती है, और पीत वस्त्र स्वर्ण-सा दमक रहा है। [2]
जिन्हें मुनि ध्यान में भी नहीं पा सकते, वे बाल-सखाओं के संग विनोद कर रहे हैं। श्रीहित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि अपने अनन्य दासों के भजन-रस की सिद्धि के हेतु यह लीला नटवर प्रकट हुये हैं। [3]

