ऐसौ बरसानों निरखि, गहबर आयो प्रेम ।
करत दण्डवत लुटत रज, छुटि गये राजस नेंम ॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (28)
ऐसे दिव्य बरसाने के दर्शन कर, गह्वर वन आदि को निहारकर, हृदय में प्रेम की तरंग उमड़ पड़ी। जैसे ही इस पावन भूमि को भावपूर्वक दण्डवत प्रणाम किया और इसकी दिव्य रज में लोटा, समस्त राजसी नियम स्वतः ही छूट गए।
करत दण्डवत लुटत रज, छुटि गये राजस नेंम ॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (28)
ऐसे दिव्य बरसाने के दर्शन कर, गह्वर वन आदि को निहारकर, हृदय में प्रेम की तरंग उमड़ पड़ी। जैसे ही इस पावन भूमि को भावपूर्वक दण्डवत प्रणाम किया और इसकी दिव्य रज में लोटा, समस्त राजसी नियम स्वतः ही छूट गए।

