राधेकृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण बोल रे - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (49)

राधेकृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण बोल रे - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (49)

(राग प्रभाती)
राधेकृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण बोल रे।
जगत बाद सों मौंन लेय मुख, हरि चरचा में खोलरे॥ [1]
स्वांस स्वांस हरि नाम सुमिर ले, मनुष जनम अनमोल रे।
भक्‍ती विद्या पढ़ो मनुष तन, नहीं रहोगे टोल रे॥ [2]
गुरु शरण में मौज करो नित, आन ठौर मत डोल रे।
"रूपमाधुरी” नाम शर्करा, प्रेम दुग्ध पी घोल रे॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (49)

राधेकृष्ण का नाम निरन्तर बोलो। संसार के व्यर्थ वाद-विवाद से मुख मोड़ लो और हरि की चर्चा में अपना मुख खोलो। [1]

हर श्वास में हरि नाम का स्मरण करो, क्योंकि यह मनुष्य जन्म अत्यन्त अनमोल है। भक्ति रूपी विद्या का अध्ययन करो, तब तुम लक्ष्य से भटकोगे नहीं। [2]

गुरु की शरण में नित्य आनंद करो, किसी अन्य स्थान पर चित्त मत डुलाओ। ‘रूपमाधुरी’ कहते हैं—नाम रूपी शर्करा को प्रेम रूपी दूध में घोलकर पियो। [3]