प्यारे तेरी वंशी राधा-राधा बोले - श्री प्रियादास

प्यारे तेरी वंशी राधा-राधा बोले - श्री प्रियादास

प्यारे तेरी वंशी राधा-राधा बोलै।
राधा रूप दिखाइ आपनौं, बिनहु मोल लियौ मोलै॥ [1]
वंशी-वंशी करि दंपति के, प्रेम-मंजूषा खोलै।
‘प्रियासखी’ राधा सुनि मोहन, गोंहन लाग्यौ डोलै॥ [2]

- श्री प्रियादास जी

हे प्यारे! तेरी वंशी निरन्तर “राधा-राधा” का ही मधुर गान करती रहती है। अपनी अलौकिक धुन में वह श्री राधा के स्वरूप को प्रकट कर, बिना किसी मूल्य के ही सबके हृदय को हर लेती है। [1]

वंशी की तान से युगल-प्रेम का अगाध भंडार उद्घाटित हो जाता है। श्री प्रियासखी कहती हैं—श्री राधा का नाम जैसे ही श्री कृष्ण के कानों में पड़ता है, वैसे ही उनका हृदय प्रेम में उन्मत्त होकर डोलने लगता है। [2]