निरये स्थिति रेवास्तु न स्यात् परपदे गतिः।
यत्र तत्र जनिर्वाऽस्तु माऽस्तुराधा पदच्युतिः ॥
- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (101)
भले ही मुझे नरक का वास मिले, भले ही कभी भी परम पद की प्राप्ति न हो, जहाँ-तहाँ कहीं भी जन्म मिलता रहे—परंतु श्री राधा के चरणों की अनन्य भक्ति अथवा उन श्री चरणों की सेवा से मेरा मन कभी भी विचलित न हो।
यत्र तत्र जनिर्वाऽस्तु माऽस्तुराधा पदच्युतिः ॥
- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (101)
भले ही मुझे नरक का वास मिले, भले ही कभी भी परम पद की प्राप्ति न हो, जहाँ-तहाँ कहीं भी जन्म मिलता रहे—परंतु श्री राधा के चरणों की अनन्य भक्ति अथवा उन श्री चरणों की सेवा से मेरा मन कभी भी विचलित न हो।

