सब रस कौ रस प्रेम है विषयी खेलै सार - श्री सूरदास, सूर सागर

सब रस कौ रस प्रेम है विषयी खेलै सार - श्री सूरदास, सूर सागर

सब रस कौ रस प्रेम है, विषयी खेलै सार।
तन-मन-धन-जोबन खसै, तऊ न मानै हार॥

- श्री सूरदास, सूर सागर (325.11)

संसार के समस्त रसों में प्रेम-रस ही सर्वोत्तम है। जैसे एक विषयी जुआरी सार (जुए की गोटियाँ) खेलते समय तन, मन, धन और यौवन अर्थात् सब कुछ दाँव पर लगा देता है। वह सब कुछ नष्ट कर बैठता है, फिर भी हार स्वीकार नहीं करता, क्योंकि उसका चित्त पूरी तरह उसी खेल में आसक्त हो जाता है। उसी प्रकार प्रेम-रस में प्रविष्ट व्यक्ति भी अपने सर्वस्व को अर्पित कर देता है और किसी भी दशा में पीछे नहीं हटता ।