जब प्रेम के पन्थ में पैर दिया - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

जब प्रेम के पन्थ में पैर दिया - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

(सवैया)
जब प्रेम के पन्थ में पैर दिया, तब क्या उसके दुख से डरना है।
जल भोजन की मत चाह करो, तलवार तले शिर को धरना है॥ [1]
बस याद में रोते हुये उनकी, निज प्राण विसर्जन भी करना है।
वह आशा निराशा लिये अपनी, कभी जीना है मित्र ! कभी मरना है॥ [2]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

जब प्रेम के मार्ग पर एक बार चरण रख दिया, तब फिर उसमें मिलने वाले दुःखों से क्यों भयभीत होना? इस मार्ग में जल और भोजन की कामना तक छोड़नी पड़ती है, और निःसंकोच तलवार के नीचे सिर धरकर चलना पड़ता है। [1]

प्रियतम की स्मृति में निरन्तर रोते हुए, स्वयं के प्राणों तक को न्यौछावर करना पड़ता है, अर्थात् पूर्ण आत्मसमर्पण करके इस मार्ग पर चलना होता है। समस्त आशा और निराशा को लेकर, हे मित्र, कभी इस प्रेम-पथ में जीवित रहना पड़ता है और कभी मृत्यु को भी स्वीकार करना पड़ता है। [2]