कब लोटूँ अति विकल ह्वै, व्रज-रजमहँ हरषाय।
करू कीच कब धूरिकी, नयननि नीर बहाय॥
- श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (3)
कब मैं अत्यन्त व्याकुल होकर, व्रज की रज में हर्षपूर्वक लोटूँगा? कब उस धूलि को अपने ही अश्रुजल से गीला कर, प्रेम का पंक बना दूँगा और प्रेमाश्रुओं की धारा बहाऊँगा?
करू कीच कब धूरिकी, नयननि नीर बहाय॥
- श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (3)
कब मैं अत्यन्त व्याकुल होकर, व्रज की रज में हर्षपूर्वक लोटूँगा? कब उस धूलि को अपने ही अश्रुजल से गीला कर, प्रेम का पंक बना दूँगा और प्रेमाश्रुओं की धारा बहाऊँगा?

