हमारे यहाँ के साधु प्रसाद न चाहें।
न वस्त्र कौ अडंगा लगावें ॥ [1]
मगन भये गुन गावें ।
प्रियाचरन छिन-छिन सहरावैं॥ [2]
बसि वृन्दावन अनत न जावें ।
ललितमोहिनी तिन्हें लड़ावें ॥ [3]
- श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (13)
हमारे यहाँ के, श्रीस्वामी हरिदास जी के अनुयायी सन्त, श्री प्रिया प्रियतम के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना पसन्द नहीं करते और न कभी वस्त्र (आदिक) का अडंगा ही लगाते हैं। [1]
वे तो आनन्द में निमग्न होकर प्रिया-प्रियतम के गुण गाते रहते हैं और श्री प्रियाजी (श्री राधा) के चरणों की प्रतिपल उपासना करते रहते हैं। [2]
वे निरन्तर श्रीवृन्दावन में ही वास करते हैं, अन्यत्र कहीं नहीं जाते । ऐसे (बड़भागी) अनन्य रसिकों को, मैं ललितमोहिनी सदा लाड़ लड़ाया करता हूँ। [3]
न वस्त्र कौ अडंगा लगावें ॥ [1]
मगन भये गुन गावें ।
प्रियाचरन छिन-छिन सहरावैं॥ [2]
बसि वृन्दावन अनत न जावें ।
ललितमोहिनी तिन्हें लड़ावें ॥ [3]
- श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (13)
हमारे यहाँ के, श्रीस्वामी हरिदास जी के अनुयायी सन्त, श्री प्रिया प्रियतम के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना पसन्द नहीं करते और न कभी वस्त्र (आदिक) का अडंगा ही लगाते हैं। [1]
वे तो आनन्द में निमग्न होकर प्रिया-प्रियतम के गुण गाते रहते हैं और श्री प्रियाजी (श्री राधा) के चरणों की प्रतिपल उपासना करते रहते हैं। [2]
वे निरन्तर श्रीवृन्दावन में ही वास करते हैं, अन्यत्र कहीं नहीं जाते । ऐसे (बड़भागी) अनन्य रसिकों को, मैं ललितमोहिनी सदा लाड़ लड़ाया करता हूँ। [3]

