नित्त सरद नित्त तीज है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (1185)

नित्त सरद नित्त तीज है - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (1185)

नित्त सरद नित्त तीज है, नित्त होरी सु बसंत ।
नित्त केलि छिन छिन नई, जाके सुखहि न अंत॥

- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (1185)

जहाँ नित्य ही शरद ऋतु है, नित्य ही तीज का उत्सव है और नित्य ही बसन्त तथा होली का आनंद है। जहाँ प्रतिक्षण युगल की नित्य नई-नई केलि-लीलाएँ होती रहती हैं, जिनके सुख का कभी अंत नहीं होता—वही नित्य वृन्दावन धाम है।