खेलत हैं वसंत विहारी विहारिन - गोस्वामी श्रीहितलाल जी

खेलत हैं वसंत विहारी विहारिन - गोस्वामी श्रीहितलाल जी

खेलत हैं वसंत विहारी विहारिन।
अबीर गुलाल घुमड़ रस अम्बुद, झर लायौ मनु रँग पिचकारिन॥ [1]
मधुर गरज बाजेनु धुनि मनु पिक, मोर कुहुक हो-हो किलकारिन।
(जय) श्रीहितलाल प्रेम उर भीजन, हँसत हँसावत दै करतारिन॥ [2]

- गोस्वामी श्रीहितलाल जी

युगल सरकार, श्री विहारी-विहारिन, आज वसंत उत्सव माना रहे हैं। अबीर और गुलाल के रस-मेघ उमड़ रहे हैं, मानो रंगों की पिचकारी से प्रेम-रंग बरस रहा हो। [1]

मधुर गर्जना-सी वाद्यों की ध्वनि है, कोयल और मोर की कुहुक और “हो हो होरी है” किलकारियाँ गूँज रही हैं। श्रीहितलाल कहते हैं — वे प्रेम से हृदयों को भिगोते हुए, स्वयं हँसते और सबको हँसाते हुए यह लीला कर रहे हैं। [2]