दरसन दै निकसि अटा में ते।
लट सरकाय दरस दै प्यारी, निकस्यो चंद घटा में ते ॥ [1]
कोटि रमा सावित्री भवानी, निकसी चरन छटा में ते ।
पुरुषोत्तम प्रभु यह रस चाख्यो, माखन कढ़्यो मठा में ते ॥ [2]
- श्री पुरुषोत्तम जी
श्री पुरुषोत्तम जी श्री राधा की सुंदर छवि का वर्णन करते हुए तथा उनके दर्शन की याचना करते हुए कहते हैं—
जब श्री राधिका अटारी से पधारकर अपने दर्शन प्रदान करती हैं और अपने मुखारविंद से काले केशों को धीरे से हटाती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो बादलों की ओट से पूर्ण चंद्रमा का उदय हो रहा हो। [1]
उनके चरण-कमलों की आभा से ऐसा आभास होता है मानो असंख्य लक्ष्मियाँ, सावित्रियाँ और भवानियाँ उसी क्षण प्रकट हो गई हों। पुरुषोत्तम जी कहते हैं कि इस दिव्य रस का आस्वादन उस ताजे मक्खन के समान है जिसे छाछ के मंथन से प्राप्त किया गया हो। [2]
लट सरकाय दरस दै प्यारी, निकस्यो चंद घटा में ते ॥ [1]
कोटि रमा सावित्री भवानी, निकसी चरन छटा में ते ।
पुरुषोत्तम प्रभु यह रस चाख्यो, माखन कढ़्यो मठा में ते ॥ [2]
- श्री पुरुषोत्तम जी
श्री पुरुषोत्तम जी श्री राधा की सुंदर छवि का वर्णन करते हुए तथा उनके दर्शन की याचना करते हुए कहते हैं—
जब श्री राधिका अटारी से पधारकर अपने दर्शन प्रदान करती हैं और अपने मुखारविंद से काले केशों को धीरे से हटाती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो बादलों की ओट से पूर्ण चंद्रमा का उदय हो रहा हो। [1]
उनके चरण-कमलों की आभा से ऐसा आभास होता है मानो असंख्य लक्ष्मियाँ, सावित्रियाँ और भवानियाँ उसी क्षण प्रकट हो गई हों। पुरुषोत्तम जी कहते हैं कि इस दिव्य रस का आस्वादन उस ताजे मक्खन के समान है जिसे छाछ के मंथन से प्राप्त किया गया हो। [2]

