भरै द्रग वारि उच्चार वन प्रेम सौं - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (24)

भरै द्रग वारि उच्चार वन प्रेम सौं - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (24)

(कवित्त)
भरै द्रग वारि उच्चार वन प्रेम सौं,
पूर्ण सोई प्रीति कब होइ मन की। [1]
षान और पान सुख सैन जो ना मिले,
दैव-गति होइ जो हासि तन की॥ [2]
विवस ह्वै जाइ अँग-अंग सत टूक जो,
तजत नहीं सूर ज्यौं भूमि रन की। [3]
होहि तन छीन दुषलीन जो कोटि विधि,
अलबेली जिन जाव रज छाँड़ि बन की॥ [4]

- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (24)

हे श्री राधारानी! श्रीवृन्दावन में निवास करते हुए वह मंगलमय क्षण कब आएगा, जब मेरे नेत्र आपके प्रेम में अविरल अश्रुधारा बहाएँगे और मेरा मुख प्रेमपूर्वक आपके नाम का उच्चारण करेगा? मेरे मन को ऐसी निष्काम और अखण्ड प्रीति-दशा कब प्राप्ति होगी? [1]

यदि मान-सम्मान, भोजन, सुख और विश्राम भी न मिलें तो भी कोई क्षोभ नहीं; यहाँ तक कि ईश्वर की इच्छा से शरीर को कष्ट या दुर्दशा ही क्यों न सहनी पड़े। [2]

यदि असहाय अवस्था में यह शरीर अंग-प्रत्यंग सहित खण्ड-खण्ड भी हो जाए, तो भी मैं वीर योद्धा की भाँति इस पावन वृन्दावन-भूमि का परित्याग कभी नहीं करूँगा। [3]

चाहे देह क्षीण हो जाए, असंख्य प्रकार के दुःख एक साथ उपस्थित हों, तथापि यह अलबेली अलि श्रीधाम वृन्दावन की पवित्र रज को छोड़कर अन्यत्र गमन करने की इच्छा कभी नहीं करेगी। [4]