भलें करो जप योग तप, दान धर्म ब्रत नेम ।
‘ललित लड़ैती’ प्रेम बिन, स्वपने कुशल न क्षेम॥
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (106)
भले ही कोई मनुष्य जप, योग, तपस्या, दान, धर्म, व्रत और नियमों में निरंतर लगा रहे, पर यदि हृदय में प्रभु के प्रति निष्कपट प्रेम का अभाव है, तो उसे स्वप्न में भी वास्तविक कल्याण, आंतरिक शांति और परम संतोष की प्राप्ति नहीं हो सकती।
‘ललित लड़ैती’ प्रेम बिन, स्वपने कुशल न क्षेम॥
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (106)
भले ही कोई मनुष्य जप, योग, तपस्या, दान, धर्म, व्रत और नियमों में निरंतर लगा रहे, पर यदि हृदय में प्रभु के प्रति निष्कपट प्रेम का अभाव है, तो उसे स्वप्न में भी वास्तविक कल्याण, आंतरिक शांति और परम संतोष की प्राप्ति नहीं हो सकती।

