आज सखि दोऊँ कुञ्जबिहारी - श्री दयाबाई

आज सखि दोऊँ कुञ्जबिहारी - श्री दयाबाई

आज सखि दोऊँ कुञ्जबिहारी ।
औचक आय मिले कुञ्जन में, लाल लाड़िली प्यारी ॥ [1]
गौर श्याम शोभाके सागर, अंग-अंग की छवि न्यारी ।
निरखत रूप सीतल भये नैना, उर आनन्द अपारी ॥ [2]
सफल मनोरथ भये सब मनके, विरहबिथा सब टारी ।
'दया’ कुँवरि दासी निज कीनी, चरनकमल पर वारी ॥ [3]

- श्री दयाबाई

श्री दयाबाई जी की भगवद्प्राप्ति की प्रबल इच्छा को देखकर उनके गुरुदेव श्री चरणदास जी ने उन्हें आज्ञा दी कि वे वृन्दावन जाएँ और वहीं वास करें। तब उन्हें श्यामा-श्याम के जो दर्शन प्राप्त हुए, उनका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है—

हे सखी! आज दोनों कुञ्ज बिहारी (श्री लाड़ली लाल) निकुंज में अचानक मुझे मिल गए। [1]

गौर और श्याम वर्ण वाले श्यामा कुंजबिहारी शोभा के सागर हैं। उनके प्रत्येक अंग की छवि अति ही निराली है। उनके रूप को निहारकर नेत्र शीतल हो गए और हृदय में अपार आनन्द भर गया। [2]

मन के समस्त मनोरथ सफल हो गए और विरह की सारी पीड़ा दूर हो गई। श्री दयाबाई कहती हैं—श्री राधा ने मुझे अपनी निज दासी बना लिया, मैं उनके चरणकमलों पर बलिहारी जाती हूँ। [3]