(राग बसंत)
वृषभानु कुँवरि खेलति बसंत, फूली सखी जहाँ नवल कंत।
ताल मृदँग बाजै अरु निसान, खेलन निकसीं सुखनिधान॥ [1]
चोबा कुंकुम मची है कीच, मृगमद सखि जवादि बीच।
सघन कुंज में सुख-तरंग, ‘कृष्णदास’ आली राधे रवन-संग॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (961)
वृषभानु की लाड़ली श्री राधा बसंत ऋतु में क्रीड़ा कर रही हैं, जहाँ उनके नवल प्रियतम श्यामसुन्दर भी विराजमान हैं। सखियाँ हर्ष से खिल उठी हैं। मृदंग, ताल और नगाड़े आदि वाद्य बज रहे हैं, और सुख की खान श्री राधा महारानी क्रीड़ा के लिए महल से बाहर पधारी हैं। [1]
चोबा और कुमकुम से रज कीचड़-सी हो गई है, सखियाँ कस्तूरी और जवादि सुगंध के बीच रमी हुई हैं। घने कुंजों में सुख की तरंगें उठ रही हैं। श्री कृष्णदास कहते हैं—सखियों सहित श्री राधा, श्री कृष्ण के संग बसंत-केलि का आनंद ले रही हैं। [2]
वृषभानु कुँवरि खेलति बसंत, फूली सखी जहाँ नवल कंत।
ताल मृदँग बाजै अरु निसान, खेलन निकसीं सुखनिधान॥ [1]
चोबा कुंकुम मची है कीच, मृगमद सखि जवादि बीच।
सघन कुंज में सुख-तरंग, ‘कृष्णदास’ आली राधे रवन-संग॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (961)
वृषभानु की लाड़ली श्री राधा बसंत ऋतु में क्रीड़ा कर रही हैं, जहाँ उनके नवल प्रियतम श्यामसुन्दर भी विराजमान हैं। सखियाँ हर्ष से खिल उठी हैं। मृदंग, ताल और नगाड़े आदि वाद्य बज रहे हैं, और सुख की खान श्री राधा महारानी क्रीड़ा के लिए महल से बाहर पधारी हैं। [1]
चोबा और कुमकुम से रज कीचड़-सी हो गई है, सखियाँ कस्तूरी और जवादि सुगंध के बीच रमी हुई हैं। घने कुंजों में सुख की तरंगें उठ रही हैं। श्री कृष्णदास कहते हैं—सखियों सहित श्री राधा, श्री कृष्ण के संग बसंत-केलि का आनंद ले रही हैं। [2]

