(राग पीलू - ताल कहरवा)
व्रजलीला रस भावै अब तौ,
श्रीगिरिराज अंक में रहिये। [1]
करिये बिनय निहोरि भाँति बहु,
स्यामरूप मृदु माधुरि लहिये॥ [2]
चलिये संग रसिक भक्तनके,
प्रेम प्रबाह मगन ह्वै बहिये। [3]
गाय गुबिंद नाम गुन कीर्तन,
जनम जनमके तहँ दुख दहिये॥ [4]
करिये कालिंदी जल मज्जन,
नित मधूकरी लै निरबहिये। [5]
जुगलप्रिया प्रीतम भुज भरिकै,
पाइय जो कछु चहिये॥ [6]
- श्री युगल प्रिया
अब तो मुझे ब्रज की दिव्य लीलाओं के अतिरिक्त और कुछ भी रुचिकर नहीं लगता। गिरिराज जी की पावन गोद में वास करना ही जीवन की परम सिद्धि प्रतीत होती है। [1]
श्री गिरिराज जी के चरणों में नाना प्रकार से दीन होकर विनय-प्रार्थना करने पर श्री श्यामसुन्दर के मृदुल, माधुर्यपूर्ण स्वरूप के साक्षात् दर्शन सुलभ हो जाते हैं। [2]
सदा रसिक भक्तों का ही संग कीजिए, जिनके सान्निध्य से प्रेम का प्रवाह स्वतः उमड़ पड़ता है और साधक उसमें तन्मय होकर निरन्तर बहता रहता है। [3]
गोविन्द के नाम और गुणों का कीर्तन करते-करते अपने जन्म-जन्मान्तरों के संचित समस्त दुःखों को भस्म कर दीजिए। [4]
नित्य श्री यमुना जी के पावन जल में स्नान कीजिए और मधुकरी द्वारा जीवन का निर्वाह करते हुए अनासक्त भाव से रहिए। [5]
श्री युगलप्रिया जी कहती हैं—“प्रियतम श्रीकृष्ण को अपनी भुजाओं में भर लो, फिर जो भी अभीष्ट हो, वह सब सहज ही प्राप्त हो जाता है।” [6]
व्रजलीला रस भावै अब तौ,
श्रीगिरिराज अंक में रहिये। [1]
करिये बिनय निहोरि भाँति बहु,
स्यामरूप मृदु माधुरि लहिये॥ [2]
चलिये संग रसिक भक्तनके,
प्रेम प्रबाह मगन ह्वै बहिये। [3]
गाय गुबिंद नाम गुन कीर्तन,
जनम जनमके तहँ दुख दहिये॥ [4]
करिये कालिंदी जल मज्जन,
नित मधूकरी लै निरबहिये। [5]
जुगलप्रिया प्रीतम भुज भरिकै,
पाइय जो कछु चहिये॥ [6]
- श्री युगल प्रिया
अब तो मुझे ब्रज की दिव्य लीलाओं के अतिरिक्त और कुछ भी रुचिकर नहीं लगता। गिरिराज जी की पावन गोद में वास करना ही जीवन की परम सिद्धि प्रतीत होती है। [1]
श्री गिरिराज जी के चरणों में नाना प्रकार से दीन होकर विनय-प्रार्थना करने पर श्री श्यामसुन्दर के मृदुल, माधुर्यपूर्ण स्वरूप के साक्षात् दर्शन सुलभ हो जाते हैं। [2]
सदा रसिक भक्तों का ही संग कीजिए, जिनके सान्निध्य से प्रेम का प्रवाह स्वतः उमड़ पड़ता है और साधक उसमें तन्मय होकर निरन्तर बहता रहता है। [3]
गोविन्द के नाम और गुणों का कीर्तन करते-करते अपने जन्म-जन्मान्तरों के संचित समस्त दुःखों को भस्म कर दीजिए। [4]
नित्य श्री यमुना जी के पावन जल में स्नान कीजिए और मधुकरी द्वारा जीवन का निर्वाह करते हुए अनासक्त भाव से रहिए। [5]
श्री युगलप्रिया जी कहती हैं—“प्रियतम श्रीकृष्ण को अपनी भुजाओं में भर लो, फिर जो भी अभीष्ट हो, वह सब सहज ही प्राप्त हो जाता है।” [6]

